बुधवार, जनवरी 22, 2014

रेखाचित्रों में स्मृतियाँ (भाग 2)

1980 में जब छात्रवृति ले कर इटली आया था तो वेनिस के पास विचेन्ज़ा नाम के शहर में रहता था. तब मेरे पास कैमरा नहीं था लेकिन एक डिज़ाईन पुस्तिका थी, जिसमें मैं रेखाचित्र बनाता था. कुछ दिन पहले तैंतीस साल पुरानी वह डिज़ाईन पुस्तिका हाथ में आ गयी. उसे देख कर, बहुत सी पुरानी बातें याद आ गयीं. दिसम्बर में एक दिन मैं विचेन्ज़ा वापस लौटा और उन सब जगहों को देखने गया जहाँ मैं प्रारम्भ के दिनों में घूमा था और  चित्र बनाये थे. यह उसी स्मृति यात्रा के विवरण का दूसरा भाग है. ( पहला भाग)

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विचेन्ज़ा शहर के पास एक पहाड़ी है, जिसका नाम है मोन्ते बेरिको (Monte Berico), यानि बेरिको की पहाड़ी. वहाँ एक मध्ययुगीन गिरज़ाघर बना हुआ है. ऊपर पहाड़ी से शहर का विहँगम दृश्य दिखता है और शहर की पृष्ठभूमि में बर्फ़ से ढके एल्पस पहाड़ भी दिखते हैं. मुझे पहाड़ी पर जाना बहुत अच्छा लगता था. अक्सर अँधेरे मुँह सुबह उठ कर ऊपर तक जाता और सूर्योदय की प्रतीक्षा करता जब उगते सूर्य की लालिमा से एल्पस पर्वत बहुत सुन्दर लगते. सुबह जाने का यह फायदा भी था कि अन्य लोगों की भीड़ नहीं होती थी.

भारत में गर्मी की वजह से सुबह घूमने जाना बहुत प्रचलित है. जहाँ बाग हो वहाँ सुबह सुबह सैर करने वालों की भीड़ लग जाती है. मुझे भी सुबह ही घूमने की आदत थी. लेकिन यहाँ ऐसा बहुत कम होता है. अधिकतर लोग सैर करने दिन में या शाम को जाते हैं.

मुझे उस पहाड़ी की ओर अँधेरा होने पर, शाम को जाना भी अच्छा लगता था. ऊपर जाने वाला रास्ता कुछ सुनसान सा होता था तो शाम को वहाँ इधर उधर युवा जोड़ों की भीड़ लग जाती थी. भारत में खुले आम चुम्बन तक नहीं देखे थे, जबकि बेरिको पहाड़ी पर युवा जोड़े एक दूसरे में इतना गुत्थम गुत्था हो रहे रहे होते थे कि उनको देखने का मन में बहुत कौतूहल होता था, जिसे जाने में कई वर्ष लगे.

एक रविवार को बेरिको पहाड़ी पर बैठ कर मैंने नीचे फ़ैले हुए शहर का चित्र बनाया. उस दिन धूप निकली थी, मौसम सुन्दर था और पहाड़ी पर बहुत से लोग घूमने आये थे. रेखाचित्र बनाने के बहाने से अन्य लोगों से मुलाकात और बातें करने का अवसर मिलता था. लोग मुझे रेखाचित्र बनाता देख कर, उसे देखने आते तो बातें शुरु हो जातीं.

उपर से दिखने वाले अधिकतर शहर को मैं नहीं पहचानता था. शहर का वह हिस्सा जहाँ मैं रहता था, केवल उसे पहनता था. शहर के उस हिस्से के बड़े स्मारक, चर्च और भवन जैसे कि प्रसिद्ध इतालवी वास्तूशास्त्र विषेशज्ञ अँद्रेया पाल्लादियो (Andrea Palladio) की बनायी गोलाकार हरी छत वाली बजिलिका (Basilica), वहाँ पहाड़ी से स्पष्ट दिखते थे.

Vicenza memories, 1980 - images by Sunil Deepak, 2014

दिसम्बर में तैतीस सालों के बाद विचेन्ज़ा लौटा तो सबसे पहले, बेरिको की पहाड़ी की ओर ही बढ़ा. चढ़ाई से साँस फ़ूलने लगी और टाँगें दुखने लगी, यानि इतने सालों के गुज़रने की तकलीफ़ होना स्वभाविक ही था.

वहाँ गया जिस जगह पर बैठ कर ऊपर वाली तस्वीर बनायी थी. वहाँ बैठा तो नीचे शहर स्पष्ट नहीं दिख रहा था, बीच में पेड़ पौधे आ रहे थे. पर अन्य जगहों से नीचे का नज़ारा अब भी पहले जितने सुन्दर था, लगता था कि शहर बिलकुल नहीं बदला. शहर की पृष्ठभूमि में बर्फ़ से ढके पहाड़ भी पहले जैसे मेरी स्मृतियों में थे, वैसे ही सुन्दर लग रह थे.

Vicenza memories, 1980 - images by Sunil Deepak, 2014

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होस्टल के पास शहर का सबसे महत्वपूर्ण स्कवायर था, "पियात्ज़ा देल्ला सिनोरिया" (Piazza della Signoria) यानि "राजघरानों का स्कवायर". इस स्कवायर में विभिन्न प्रसिद्ध भवन बने हैं, जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण है पाल्लादियो का हरी छत वाला बजिलिका. बीच में एक ऊँचा घँटाघर है और उसके सामने दो ऊँचे खम्बे बने हैं, एक पर वेनिस गणतंत्र का चिन्ह शेर है और दूसरे पर एक पुरुष मूर्ति बनी है. वहाँ बैठ कर मुझे लगता मानो बेनहुर या टेन कमान्डमैंटस जैसी किसी फ़िल्म के सेट पर आ गया हूँ.

एक दिन में वहाँ बैठ कर खम्बे पर बनी पुरुष मूर्ति की तस्वीर बना रहा था तो तीन इतालवी युवकों से बातचीत हुई.

Vicenza memories, 1980 - images by Sunil Deepak, 2014

वे तीनो युवक मिलेटरी की ट्रेनिंग के लिए विचेन्ज़ा आये थे. उस समय इटली में हर नवयुवक को अठारह वर्ष पूरे करने पर, एक साल के लिए मिलेटरी में बिताना लेना अनिवार्य होता था. युवा लोगों को हाई स्कूल पास करने के बाद और कोलिज की पढ़ाई पूरी करने से पहले, जीवन का एक साल पढ़ाई को छोड़ कर, देश के नाम देना पड़ता था. बहुत से युवा मन्नत माँगते थे कि उनके मेडिकल चेकअप में कोई कमी निकल आये जिससे उन्हें मिलेटरी सर्विस के उस एक साल से छुट्टी मिल जाये. जो लोग मिलेटरी में हिस्सा नहीं लेना चाहते थे, उन्हें एक साल के बजाय, दो सालों के लिए समाज सेवा का कोई काम करना होता था. इसलिए एक साल बचाने के लिए लोग मिलेटरी की सर्विस न चाहते हुए भी कर लेते थे.

उन तीन युवकों के नाम थे एत्ज़िओ, फ्राँचेस्को और मारिउत्ज़ो. फ्राँचेस्को को मिलेटरी में वह वर्ष बिता कर "बेकार करने" का बहुत गुस्सा था. जबकि एत्ज़िओ को कविता लिखने का शौक था. उस दिन एत्ज़ओ ने मेरी डिज़ाइन पुस्तिका पर दो कविताएँ लिखी. तब कुछ बात करने लायक इतालवी तो आ गयी थी लेकिन एत्ज़िओ की कविता मुझसे समझ नहीं आयी थी. अब समझ में आती है. उसमें एत्ज़िओ ने लिखा थाः

Vicenza memories, 1980 - images by Sunil Deepak, 2014
"... मैं आसपास देखता हूँ
अपनी छोटी सी खिड़की से
एक बिन पेड़ों की दुनिया
घर, और अन्य घर
और कुछ नहीं.
प्रिय दूर के मित्र
तुम्हें लिखना चाहता हूँ
लेकिन मेरे हाथ एक खालीपन में सिमट जाते हैं ..."
इस बार, तैंतीस साल बाद जब उस स्कवायर में लौटा तो लगा कि कुछ भी नहीं बदला था. वहीं अपनी पुरानी सीढ़ियों पर बैठ कर मैंने आइसक्रीम खाई, जहाँ उस दोपहर को बैठा था जब एत्ज़िओ, फ्राँचेस्को और मारिउत्ज़ो मिले थे. क्या जाने वह तीनो अब कहाँ होंगे और जीवन के रास्ते उन्हें किन दिशाओं में ले गये होंगे!

Vicenza memories, 1980 - images by Sunil Deepak, 2014

Vicenza memories, 1980 - images by Sunil Deepak, 2014

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नदी के किनारे पर बना क्वेरीनी पार्क (Parco Querini) मुझे बहुत अच्छा लगता था. बाग की हरियाली के बीच में नदी से ली हुई एक छोटी सी नहर बनी थी जिसमें बतखें तैरती थीं और बच्चे उन्हें रोटी के टुकड़े डालते थे. नहर के एक गोल घुमाव के बीच में एक छोटी सी पहाड़ी थी जिस पर एक गुम्बज वाली छतरी बनी थी. तभी कुछ दिन पहले समाचार सुना था कि उस गुम्बज पर बिजली गिरी थी और उसके नीचे बैठे एक पंद्रह वर्ष के लड़के की मृत्यू हो गयी थी. इस वजह से मुझे उस गुम्बज से डर भी लगता था और उसकी ओर आकर्षित भी होता था.

Vicenza memories, 1980 - images by Sunil Deepak, 2014

एक दिन में वहाँ बाग में लगी मूर्तियों की तस्वीर बना रहा था तो एक अमरीकी लड़का मेरे पास आया था. कोट, टाई पहने हुए, वह लड़का किसी एवान्जेलिक चर्च का प्रचारक था जिससे कई घँटे तक मैंने धर्म के विषय पर बहस की थी. इस बात को बिल्कुल भूल गया था लेकिन बाग की वह बैन्च देखी जहाँ मैं उस दिन बैठा था तो यह सारी बात याद आ गयी. पार्क में भी कोई विषेश अन्तर नहीं दिखा.

Vicenza memories, 1980 - images by Sunil Deepak, 2014

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क्रमशः  -  पहला भाग

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14 टिप्‍पणियां:

  1. रेखाचित्रों से आजतक अधिक नहीं बदला है, आत्मा उतारी है।

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  2. कल 25/01/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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    1. मेरे लिखे को अपनी "हलचल" में जगह देने के लिए धन्यवाद यश :)

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  3. शुभ प्रभात
    सच में
    अच्छा लगा
    यहां आकर...

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    1. शुभप्रभात दिग्विजय और धन्यवाद :)

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  4. बहुत सुन्दर रेखा चित्र और रोचक विवरण

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    1. सराहना के लिए बहुत धन्यवाद ओँकार

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  5. aap shabdon aur rekhaaon dono ko hi khoobsoorati se kaagaz par utaar lete hain.. interesting memoir ..

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    1. धन्यवाद भावना, आप जैसे पाठक हों तो खुशी होती है! :)

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  6. संस्‍मरण रोचक लगा। सुन्‍दर अनुभूति हुई इसे पढ़कर। उस लड़के ने बहुत अच्‍छी कविता लिखी।

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    1. धन्यवाद विकेष. मैंने भी इतने सालों बाद उन कविताओं को पढ़ा और इस बार उनके अर्थ समझे तो मुझे उस युवा कवि की अभिव्यक्ति सुन्दर लगी! :)

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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