बुधवार, मई 07, 2008

यादें

2002 में इंटरनेट पर पहली बार अपना एक पृष्ठ बनाया था, उसका नाम था "सृजन". उसे बनाने के लिए शुशा फोंट से कम्पयूटर पर हिंदी लिखना सीखा था. इस पृष्ठ के बनाने के पीछे माँ की चिंता थी. "तुम्हारे पापा ने जो लिखा है उसे सहेजना है, उसे छपवाना है" यह माँ के जीवन का ध्येय बन गया था. मेरे पिता ओमप्रकाश दीपक शायद पत्रकार, लेखक आदि से पहले समाजवादी चिंतक थे. 1975 में जब अचानक उनकी मृत्यु हुई तो वह 46 वर्ष के थे. माँ तब 44 साल की थी. मैं उस समय अपने पिता के लेखन के बारे में कुछ नहीं जानता था, कभी उनका लिखा कुछ नहीं पढ़ा था. डा. लोहिया, किशन पटनायक, रमा मित्रा, अशोक सेकसरिया जैसे समाजवादी लोग या रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जैसे लेखक लोगों को उनके मित्रों या साथियों के रूप में जानता था, पर वह क्या सोचते हैं, क्या लिखते हैं, इसके बारे में कुछ नहीं जानता था, न ही उनसे कुछ बात होती थी. मेरी दुनिया, मेरे मित्र, मेरी दिलचस्पियाँ अलग थीं. 1972 से मेडिकल कालेज जाने के बाद से घर में कम ही रहता था, जब होता भी तो पापा क्या सोचते हैं, क्या लिखते हैं, इसके बारे में मन में कोई जिज्ञासा नहीं होती थी.

जब माँ दिल्ली नगरपालिका के प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाध्यापिका के पद से रिटायर हुईं तो उन्होंने पापा के सब कागज पत्री जो सम्भाल कर रखी थीं उन्हें पढ़ने, छाँटने का काम करना शुरु कर दिया था. जब भी भारत जाता तो माँ हर बार वही बात करती. यह कहानियाँ निकाली हैं, यह लेख निकाले हैं, यह करना है, वह करना है. मैं उनकी बात सुनता पर उसके बारे में अधिक नहीं सोचता. बच्चे अपने माँ पिता को केवल माँ पिता के ढांचे में ही देख पाते है, उससे पार जाना शायद उनके लिए कठिन होता है. मेरे लिए तो कम से कम यही बात थी.

11 सितंबर 2001 जिस दिन न्यू योर्क और वाशिंगटन में आतंकवादियों के हमले हो रहे थे, उस सुबह माँ वाशिंगटन पहुँचने वाली थी, पर उनका जहाज़ केनेडा में कहीं भेजा गया, उसके बाद कई दिन तक हम लोग उनकी सूचना पाने के लिए भटकते रहे थे. शायद उसी घटना का असर था या कोई और बात थी, तब से माँ की यादाश्त कम होने लगी. उनका कागज़ो को ले कर बैठना और कुछ न समझ पाने से कागज़ों को आगे पीछे देखना मुझे दुखद लगा. किसी ने कहा कि आप के पास तो पैसे की कमी नहीं, पैसे दे कर इन किताबों, लेखों को छपवा दीजिये क्योंकि इनका बाज़ार नहीं. तभी सोचा कि ऐसे अपने मन की पूरी करने को कुछ छपवाने से क्या लाभ. पापा की किताबों से कुछ कमाई हो इसकी तो हमें आवश्यकता नहीं थी. तब मन में विचार आया कि क्यों न सब सामग्री को इंटरनेट पर रखा जाये जिससे अगर कोई पढ़ना चाहे तो उसे दिक्कत नहीं होगी.

तब पहली बार पापा ने क्या लिखा था यह पढ़ना शुरु किया. कई बार पढ़ कर आश्चर्य होता है कि उस समय मैं भी घर में रहता था, क्यों यह सब बातें मुझे मालूम ही नहीं चलीं? बहुत बार दुख होता है कि पापा को व्यक्ति के रूप में नहीं जाना, बस पिता के रूप में ही देखा. उनके लिखे कुछ लेखों कहानियों को इंटरनेट के लिए युनीकोड में लिखा है. इस बीच "सृजन" बदल कर "कल्पना" हो गया और उसमें पापा के अतिरिक्त बहुत कुछ भर गया.

पिछले साल अफलातून जी ने पापा के बारे सूर्यनारायण जी का 1979 में लिखा एक लेख भेजा तो सोचा था कि उसे कल्पना के लिए तैयार करूँगा, फ़िर कागज़ो के नीचे वह कागज कहीं दब कर रह गये. आज सुबह सफाई करते समय जब उन्हें देखा तो सोचा कि बिना देरी किये तुरंत उसे लिख कर कल्पना पर डालना है. सूर्यनारायण जी कौन हैं, कहाँ रहते हैं, अभी जीवित है, यह सब कुछ नहीं मालूम, उनके और मेरे बीच यहीं सम्बंध है पापा के माध्यम से. इतने छोटे से सम्बंध होने पर भी उनके शब्दों में मुझे मन तक छूने की क्षमता है. तभी यह सब बातें मन में आ रही थीं. उन्होंने लिखा थाः

"एक बार मैंने अपनी रचना गोष्ठी में उन्हें मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित किया. विषय था "हिंदी साहित्य की वर्तमान प्रवित्ति". उन्होंने अपने अनूठे ढंग से हिदी साहित्य की प्रवित्तियों का उस दिन जो विश्लेषण प्रस्तुत किया, उसे सुन कर मुझे दीपकजी के बारे में पहली बार "संदेह" पैदा हुआ कि यह व्यक्ति मूल रूप में क्या है, राजनीतिक व्यक्ति है या लेखक. मेरा "संदेह" गलत था क्योंकि दीपकजी की राजनीति के बारे में सोच और साहित्य के बारे में सोच की प्रेरणा एक ही थी. संवेदना और करुणा ही उन्हें राजनीति की ओर प्रेरित करती थीं और ये ही साहित्य की ओर भी. गोष्ठी में देवीदत्त पोद्दार ने उनके उपन्यास "कुछ ज़िन्दगियाँ बेमतलब" की भी चरचा की. दीपकजी ने सामान्य आदमी को आधार बना कर हिंदी में बिल्कुल एक नये ढंग की यात्रा वृतांत शैली भी विकसित की. चाहे बंगलादेश के स्वत्रतासंग्राम का वर्णन हो (पैदल और किन किन कठिन परिस्थितियों में उन्होंने बंगलादेश की यात्रा की और मुक्तिवाहिनी के लोगों से सम्पर्क किया, यह तो शायद पूरी तरह दिनेशदास गुप्त ही जानते हैं), चाहे महाराष्ट्र के किसी आकाल क्षेत्र का, चाहे श्रीवस्ती की प्रचीन बस्ती के नजदीक से गुजरने का प्रसंग हो, उनकी दृष्टि हमेशा समान्य आदमी की जिन्दगी को टटलोती रहती थी. इस जिन्दगी को समझने और उसे बदलने की कामना उनके राजनीतिक लेखन, यात्रा वृतांतों और उपन्यास में हर जगह है.

दीपक जी ने दिनमान के "आधुनिक विचार" स्तम्भ और साप्ताहिक हिंदुस्तान में पश्चिमी विचारकों, महत्वपूर्ण पुस्तकों और भारतीय समाज की "अनपची" समस्याओं पर जो लेख लिखे, उनका शायद सामाजिक महत्व से ज्यादा महत्व नहीं माना जाये लेकिन इन लेखों के पीछे उनकी कोशिश हिंदी के पाठक को गहराई से सोचने समझने के लिए प्रेरित करने की थी. उनके यह लेख भी पाठक को झिंझोड़ते थे और वह शायद पाठक को झिंझोड़ना चाहते भी थे."
पूरा लेख कल्पना पर पढ़ सकते हैं. मैं इस समय केवल सूर्यनारायण जी को धन्यवाद कहना चाहूँगा जिन्होंने यह लेख लिखा था, और अफलातून जी को भी धन्यवाद कहना चाहूँगा जिन्होंने यह लेख मुझ तक पहुँचाया. धन्यवाद के लिए कुछ फ़ूल जिनका नाम मुझे मालूम नहीं पर जो मुझे बहुत अच्छे लगते हैं.









6 टिप्‍पणियां:

  1. पिता जी के लिये यह आपकी सच्ची श्रध्दांजली है।

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  2. सोचने को मजबूर कर दिया आपकी पोस्ट ने एक बार फ़िर। हमारे साथ के लोगों को हम कितना कम जान पाते हैं। जब जानना चाहते हैं वे हमसे दूर जा चुके होते हैं।

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  3. सुशील कुमार7 मई 2008 को 8:54 am

    इक आदमी में होते है दस बीस आदमी।
    जिसको भी देखना हो कई बार देखना॥
    निदा फाजली
    सुन्दर यादे। पढ कर भावुक हो गया।

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  4. अपनो के बारे में बहुतो ने लिखा है, लेखक कहे जाने वालो ने लिखा है, मगर ऐसा सरल-सरस नहीं.

    सून्दर वर्णन.

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  5. आपकी बात बॉंधती हैं, इसमें भाव हैं पर कोरी भावुकता नहीं है- अपने पिता के विषय में और जानें तथा जितना बता सकें हमें भी बताएं

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  6. पिता जी की रचनाएं नेट पर डालने का विचार बड़िया है। अक्सर हम अपने मां बाप का सही आंकलन तभी करते हैं जब वो हमसे बहुत दूर जा चुके होते हैं , ज्यादातर लोगों के साथ ऐसा ही होता है।

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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