सोमवार, अप्रैल 09, 2007

भारतीय सीख

रोम से एक पुस्तक प्रकाशक ने सम्पर्क किया और पूछा कि क्या मैं एक पुस्तक की समीक्षा करना चाहूँगा? बोला कि वह मेरा इतालवी चिट्ठा पढ़ता है जो उसे अच्छा लगता है और चूँकि यह किताब एक भारतीय लेखक की है, वह चाहता है कि मैं इसके बारे में अपनी राय दूँ.

अच्छा, कौन है लेखक? मैंने उत्सुक्ता से पूछा, क्योंकि इटली में रहने वाला कोई भारतीय लेखक भी है यह मुझे मालूम नहीं था. पता चला कि कोई ज़हूर अहमद ज़रगार नाम के लेखक हैं जो कि कश्मीर से हैं और पश्चिमी उत्तरी इटली में सवोना नाम के शहर में रहते हैं जिन्होंने भारतीय कहानियों पर किताब लिखी है.

जब किताब मिली तो देख कर कुछ आश्चर्य हुआ, उस पर शिव, पार्वती और गणेश की तस्वीर थी. जब नाम सुना था और यह जाना था कि ज़हूर कश्मीर से हें तो मन में छवि सी बन गयी थी कि अवश्य भारत विरोधी, कट्टर किस्म के व्यक्ति होंगे. किताब पढ़नी शुरु की तो बहुत अच्छी लगी. अहमद, किताब का हीरो लखनई रेलवे स्टेशन पर फ़ल बेचता है और माँ की चुनी लड़की से विवाह के सपने भी, पर अचानक एक दिन स्टेश्न पर उसकी मुलाकात एक व्यास गिरी नाम के साधू से होती है और वह सब कुछ छोड़ कर यात्रा पर निकल पड़ता है. अलग अलग शहरों में उसकी मुलाकात विभिन्न लोगों से होती है और यात्रा की कहानी में अन्य कई कहानियाँ जुड़ती जातीं हैं पर उसे किस चीज़ की तलाश है यह वह समझ नहीं पाता.

उनके बारे में खोज की पता चला कि वह उत्तर पश्चिमी इटली के लिगूरिया प्रदेश में मुस्लिम एसोशियेशन के अध्यक्ष हैं. ऐसी एसोशियोशनों और उनसे जुड़े लोगों के बारे में मन में जो तस्वीर थी उसमें लेखक ज़हूर फिट नहीं बैठता था. अंतर्जाल पर उनके लिखे कुछ लेख पढ़े जिसमें उनका उदारवादी, आधुनिक मुस्लिम दृष्टिकोण झलकता था तो उनसे ईमेल के द्वारा सम्पर्क किया.
परसों रात को अचानक उनका टेलीफ़ोन आया, बोले, बोलोनिया एक मीटिंग में आ रहा हूँ, क्या मिल सकते हैं?

तो कल उनसे मुलाकात भी हुई. श्रीनगर से हैं वह और भारत में उनकी सोने के गहनों की दुकाने थीं. पत्नी उनकी इटालवी हैं और जब कश्मीर में हालात बिगड़े तो वह अपनी पत्नी और बच्चों के साथ यहाँ इटली में आ गये और करीब बीस साल से यहीं रहते हैं. बिसनेस के साथ साथ उन्होंने लिखना भी शुरु किया और कई किताबें छप चुकीं हैं. कहते हें कि पहले उर्दू में लिख कर उसका इतालवी में अनुवाद करते थे पर अब तो सीधा ही इतालवी में लिखते हैं.

बोले कि वह बोलोनिया इतालवी राष्ट्रीय मुस्लिम एसोसियेशन की मीटिंग में आये थे और उनका ध्येय है कि वृहद मुस्लिम समाज को भारतीय ध्रमों के साथ मिल जुल कर रहने के बारे में बता सकें. "मैं बहुत धार्मिक नहीं हूँ, जिस परिवार में पैदा हुआ हमें यही सिखाया गया कि सभी धर्मों का आदर करो, साथ पढ़ने वालों में हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, सभी धर्मों के लोग थे. मुसलमान परिवार में पैदा हुआ तो मुसलमान हो गया, किसी और धर्म के परिवार में पैदा होता तो कुछ और बन जाता, तो फ़िर धर्म को ले कर इतने झगड़े क्यों? अरब देशों वाले लोगों ने सिर्फ इस्लाम देखा है, यहाँ इटली वालों ने सिर्फ कैथोलिक धर्म देखा है, इन्हें भारत जैसा अनुभव नहीं कि कैसे विभिन्न धर्म वाले साथ साथ रहें और हम भारतीयों को दुनिया को यह बताना है, अपना तरीका सिखाना है. इसीलिए मैं इस एसोशियेशन में आया हूँ और मैं सब से अपनी बात स्पष्ट कहता हूँ, कोई डर नहीं मुझे."

ज़हूर बहुत अच्छे लगे मुझे. शायद फ़िर उनसे अगली बार मिल कर उनके बारे में और जानने का मौका मिलगा. जाते जाते अगली बार मीटिंग में आने पर मिलने का वादा भी किया है उन्होंने.


12 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छा लगा इनके बारे में पढकर ।किताब दिलचस्प होगी ।

    जवाब देंहटाएं
  2. जहूर सलाम आपको. मियाँ आपकी जरूरत भारत को भी बहूत है.
    दूनिया तक भारत के संस्कारो को पहूँचाने के लिए साधूवाद.

    सुनीलजी, आपको चिट्ठा जगत में वापस देख अच्छा लग रहा है. मिस्र के संस्मरणो का इंतजार है.

    जवाब देंहटाएं
  3. अच्छा संसमरणात्मक चित्र खींचा है आपने

    जवाब देंहटाएं
  4. जानकर ख़ुशी होई और ये जानकारी देने के लिए आपका शुक्रिया

    जवाब देंहटाएं
  5. इनकी किताब जरूर पढना चाहेंगे.

    जवाब देंहटाएं
  6. अच्छी लगी यह जानकारी, शुक्रिया.

    जवाब देंहटाएं
  7. सुनील जी धन्यवाद,
    जहूर जी से मैने २४ जनवरी २००५ को पेरिस मे मिला था, हम लोग साथ साथ भारत से इटली आये थे। काफ़ी बातें हुई थीं।
    पिछले साल जब जेनोआ गया था तब भी बात हुई, यहाँ पर उनको देख के सारी यादें तज़ा हो गयी।

    जवाब देंहटाएं
  8. तुम्हारा 'पोस्ट' पढ़्कर बहुत ही अच्छा लगा ।
    ज़हूर अहमद ज़र्गार से मैं भी मिलना चाहूँगी ।
    दुनियां में ऐसे लोगों की सख्त़ ज़रूरत हैं ।
    ऐसे ही लिख्ते रहो,और ऐसे अच्छे लोगों से मिलते रहो,यही दुआ हैं !
    स्वाति
    बनारस

    जवाब देंहटाएं
  9. सुनील जी, इस लेख को लिखने व हमें ज़हूर अहमद ज़रगार जैसे व्यक्ति के बारे में बताने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद । इनके बारे में और भी लिखें व इनकी रचनाओं क जानकारी हमें देते रहिए ।
    मैंने अपने एक लेख जो दुर्भाग्य से विवादास्मक हो गया व अपनी एक कविता में भी ज़हूर जी जैसे विचार रखे थे । 'फिर वही बात, जैसा कि मैंने अपनी कविता में कहा है, 'यह मैं भी तो हो सकती थी ।' मैंने अपना धर्म सब धर्मों को पढ़कर सोच विचार करके नहीं चुना था । ठीक वेसे ही अधिकतर लोग किसी धर्म में जन्म लेते हैं, किसी देश, रंग में जन्म लेते हैं अतः उन्हें उसके लिए सजा देना गलत है ।'
    लेख पढ़कर बहुत खुशी हुई ।
    घुघूती बासूती

    जवाब देंहटाएं
  10. "मुसलमान परिवार में पैदा हुआ तो मुसलमान हो गया"
    विनोबा इसीलिए कहते थे कि पन्द्रह साल की उम्र तक धर्म न हो ,फिर वह तय करे कि उसका धर्म कौन सा रहेगा ।
    इस्लाम में भी शायद इसी तर्क के आधार पर बच्चों को आचरण सम्बन्धी नियमों से मुक्त रखा गया है । फिर भी बचपन से ही रोजा रखने का उत्साह तो रहता ही है - भले ही एक-दो रखे हों।

    जवाब देंहटाएं
  11. ऐसे लोग, ऐसे विचार कम होते हैं, मगर होते हैं, यहीं बेहतर ज़िंदगी की संभावना जन्म लेती है।

    जवाब देंहटाएं
  12. वहीं नहीं साहब इन जहूर साहब के विचारों ओर आपके दृष्टिकोण की जरूरत इधर चिटृठाजगत में भी कई लोगों को है।
    खैर
    :
    :
    आपसे अनुरोध कि कुछ अधिक नियमित लिखा करें. ...... 'कितने पाकिस्‍तान' के शब्‍दों में कहें तो गिलगिमेश की आवाज सुनाई देती रहनी चाहिए।

    जवाब देंहटाएं

"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

इस वर्ष के लोकप्रिय आलेख