शुक्रवार, फ़रवरी 09, 2007

रुकावटें

कुछ दिन पहले रवि ने एक टिप्पणी में लिखा थाः

"साथ ही, मेरे जैसे 50 वर्ष की सीमा की ओर पहुँच रहे लोगों की आँखों में श्याम पृष्ठभूमि पर सफेद अक्षर तो दिखाई ही नहीं देता..."

कुछ ऐसा ही हाल मेरा अपना भी था. कंप्यूटर का मोनिटर अधिक करीब हो तो ऐनक उतार कर पढ़ने की कोशिश करता, कुछ दूर हो तो ऐनक लगाता, पर अपने ही चिट्ठे के अक्षर ठीक से नहीं दिखते थे. झँझट यह था कि इस चिट्ठे के टैम्पलेट के रंगों को कौन ठीक करे? जब छायाचित्रकार वाले फोटो चिट्ठे के रंग ठीक करने थे तो राम ने मदद की थी, दुबारा किसी से कहने में शर्म आ रही थी. फ़िर मन में सोचा कि इतना भी क्या कठिन होगा, कोशिश करके देखें. कुछ दिनों तक सारा खाली समय टेम्पलेट से छेड़खानी में बिताया और आखिरकार कल रात को लगा कि अब कुछ ठीक दिख रहा है.

इतनी मेहनत करनी पड़ी, पर कुछ संतोष भी है कि आखिरकार काम हो ही गया. यह तो आप लोग ही बता सकते हैं कि इस चिट्ठे के नये रुप में क्या कमियाँ रह गयीं हैं.

उम्र के साथ साथ इस तरह की परेशानियाँ बढ़तीं जातीं हैं. दिखता कम है, सुनता कम है, अधिक चलना पड़े तो भी मुश्किल, सीढ़ियाँ हों तो भी मुश्किल. और दुनिया है कि दिन ब दिन तेज़ गति से चलती जा रही है, या शायद यह अपना भ्रम है क्योंकि अपनी गति धीमी हो रही है!

पर यह सच है कि उम्र के साथ ही समझ में आता है जब विकलाँग लोग कहते हैं कि दुनिया हर तरफ़ से रुकावटों से भरी हुई है. विकलाँगता को हमेशा से व्यक्तिगत या पारिवारिक समस्या की तरह देखा जाता था. यानि अगर आप विकलाँग हैं तो इसका अर्थ है कि आप के शरीर में कोई कमी है और उस कमी को ठीक करने की कोशिश की जाये.

कुछ दशक पहले विकलाँग लोगों की संस्थाओं ने एक दूसरा दृष्टिकोण पेश किया. उनका कहना था कि विकलाँगता व्यक्ति के शरीर में नहीं समाज में होती है क्योंकि यह समाज केवल अविकलाँग, जवान लोगों के लिए सोचा और बना है. यह समाज अन्य सभी लोगों के लिए उनके आस पास कुछ रुकावटें खड़ी कर देता है जिनके कारण वह लोग जीवन में ठीक से भाग नहीं ले पाते. उनका कहना था कि इलाज व्यक्ति का नहीं, समाज में बिखरी इन रुकावटों का होना चाहिये.

इस सोच ने कुछ सामाजिक परिवर्तनों को प्रेरित किया है जैसे कि पटरी से चढ़ने उतरने के लिए ढलानें बनाना, सीढ़ियों के साथ रेम्प बनाना, लाल बत्ती पर अँधे लोगों के लिए ध्वनि वाला सिगनल बनाना, लिफ़्ट में विभिन्न मंज़िलों के नम्बर ब्रेल में भी लिखना, इत्यादि. इनका लाभ केवल विकलाँग लोगों को नहीं मिलता बल्कि सारे समाज को मिलता है. जैसे कि अगर पटरी पर चढ़ने उतरने के लिए ढलान है तो व्हीलचेयर को चलाने में आसानी तो होगी ही पर साथ ही, बच्चे के साथ जा रहे परिवारों को भी होगी, उन बूढ़ों को भी होगी जिनके घुटनों मे दर्द हो.

अंतर्जाल पर ही उतना ही आवश्यक है कि हम जाल स्थलों को इस तरह बनाये कि विभिन्न विकलाँग लोग भी उनका प्रयोग कर सकें.

पर बहुत सी बातें कहना आसान है पर करना कठिन. एक उदाहरण हमारे शहर बोलोनिया से. यहाँ की सरकार विकलाँग लोगों के बारे में बहुत सचेत है., पर कुछ समय पहले यहाँ निर्णय लिया गया कि बहुत सी चौराहों पर लाल बत्ती के बदले में गोल चक्कर बना दिया जायेंगे क्योंकि उससे यातायात अधिक तेज़ चलता है. अगर कारों, ट्रकों को चलने में फ़ायदा होगा और लाल बत्ती पर नहीं रुकना पड़ेगा तो प्रदूषण कम होगा और पेट्रोल का खर्चा भी. पर यह देखा गया है कि गोल चक्कर बनने से यातायात की गति तीव्र हो जाती है और पैदल चलने वालों और साईकल पर जाने वालों को अधिक कठिनाई होती है. विकलाँग, वृद्ध, गर्भवति स्त्रियाँ आदि लोगों को सड़क पार करने में और भी कठिनाई होती है.

तो किसका सोचे सरकार, यातायात का या पैदल चलने वालों का? मेरा बस चले तो पहले पैदल चलने वालों का सोचा जाये पर अगर आप सरकार में हों तो आप क्या फैसला करेंगे?

5 टिप्‍पणियां:

  1. नए रूप का रंग-संयोजन पिछले वाले से कम अच्छा लगा।शायद 'खाकी' के कारण मुझे ही ऐसा लग रहा है ।
    पढ़ने में यह ज्यादा आरामदायक है।
    आपके शहर के गोलचक्कर अभी स्पष्ट नहीं हुए।

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  2. संजय बेंगाणी9 फ़रवरी 2007 को 1:44 pm

    अब पढ़ना आसान हो गया है. लगता है काफी मेहनत की है.

    विकलाँगो का ध्यान रखा ही जाना चाहिए, मगर वस्तुओं को बनाते समय बहूसंख्यक लोगो को ही ध्यान रखा जाना सम्भव होता है.

    विकलाँगो का ध्यान रखना कर्तव्य है, जबकी स्वस्थ लोगो के हिसाब से चीजे बनाना व्यवहारीकता है.

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  3. हां, अब सही है। हमारे दोस्‍त प्रमोद सिंह कहते हैं कि अगर साज-सज्‍जा आंखों को सुकून न दे तो अच्‍छी सामग्री भी पढ़ने का मन नहीं करता। वैसे जो डिज़ाइन पहले था, वह भी बुरा नहीं था, लेकिन इंटरनेट के लिहाज़ से वो थोड़ा भारी था। काले अक्षर के पीछे हल्‍का पीला पृष्‍ठ ठीक रहता है। आपने देखा होगा कि मोहल्‍ले में भी हमने कुछ ऐसी ही कोशिश कर रखी है।

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  4. कुछ समय पहले यहाँ निर्णय लिया गया कि बहुत सी चौराहों पर लाल बत्ती के बदले में गोल चक्कर बना दिया जायेंगे क्योंकि उससे यातायात अधिक तेज़ चलता है. अगर कारों, ट्रकों को चलने में फ़ायदा होगा और लाल बत्ती पर नहीं रुकना पड़ेगा तो प्रदूषण कम होगा और पेट्रोल का खर्चा भी. पर यह देखा गया है कि गोल चक्कर बनने से यातायात की गति तीव्र हो जाती है और पैदल चलने वालों और साईकल पर जाने वालों को अधिक कठिनाई होती है. विकलाँग, वृद्ध, गर्भवति स्त्रियाँ आदि लोगों को सड़क पार करने में और भी कठिनाई होती है.

    तो किसका सोचे सरकार, यातायात का या पैदल चलने वालों का? मेरा बस चले तो पहले पैदल चलने वालों का सोचा जाये पर अगर आप सरकार में हों तो आप क्या फैसला करेंगे?


    मैं समझता हूँ कि दोनों का ख़्याल भी रखा जा सकता है। गोल चक्कर बना यातायात को आसान किया जाए और overbridge या subway बना पैदल यात्रियों को सड़क पार करने का सुरक्षित ज़रिया मुहैया कराया जाए। एक अन्य तरीका यह भी हो सकता है कि underpass बना के सीधे जाने वाले वाहनों को ट्रैफ़िक सिग्नल की ज़हमत से बचाया जाए, इस तरह केवल एक ओर से दूसरी ओर मुड़ने वालों को ट्रैफ़िक सिग्नल पर रूकने की आवश्यकता होगी जिससे सिग्नल पर रूकने वालों की संख्या कम हो जाएगी तथा पैदल यात्री भी आराम से सड़क पार कर सकेंगे।

    और भी एकाध विकल्प हो सकते हैं जो कि अभी फ़िलहाल दिमाग में नहीं आ रहे। :)

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  5. धन्यवाद ,अब आँखों को आराम मिला । आपने यह काम अच्छा किया । जहाँ तक मेरा खयाल है, जब भी कोई सार्वजनिक स्थान बनाया जाए तो सबके आराम का ध्यान रखना चाहिए । यह आवश्यक नहीं है कि किसी विकलांग को उसकी विकलांगता ,किसी वृद्ध को उसकी बढ़ती उम्र का हर पल ध्यान दिलाया जाए । याद रखने की बात यह है कि किसी न किसी समय प्रत्येक व्यक्ति को इन सुविधाओं की आवश्यकता पड़ती है । हम इन लोगों का कितना ध्यान रखते हैं यह भी हमारे समाज के परिपक्व व विकसित होने का एक मापदंड है ।

    घुघूती बासूती
    ghughutibasuti.blogspot.com

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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