गुरुवार, जुलाई 28, 2005

कल के सपने

कितने साल बीत गये. रेने और इवोन फ्राँस से आये थे. नाना जी के खेत पर उन्होंने आपना तम्बू गाड़ा था. उन्होंने ही मेरी जान पहचान करवायी मेरी क्रिस्टीन से. ३९ साल हो गये इस बात को. चिट्ठी से ही बातचीत होती थी हमारी, पहली बार मिले १९८० में जब मैं लियोन गया था. कल मेरी क्रिस्टीन का पत्र आया है. उसे आज भी चिट्ठी लिखना अच्छा लगता है जबकि मुझे किसी को चिट्ठी लिखे हुए ज़माने हो गये. पर इसे कहते हैं दोस्ती.

मेरी क्रिस्टीन ने भेजा था मेरा पहला कैमरा मुझे. दूसरा कैमरा मिला था शादी पर, इतालवी मित्रों से. अपने आप खरीदा हुआ पहला कैमरा मैंने अभी कुछ साल पहले ही खरीदा था. खरीदने से पहले, कई दुकाने घूम कर आया, दोस्तों से सलाह माँगी, कई दिन सोचा. एक्वाडोर से वापस आने पर अपने खोये हुए कैमरे के बदले में नया खरीदना था, पर इस बार कहीं नहीं गया, बस अंतरजाल पर ढूँढा और एक शाम कम्प्यूटर के सामने बिता कर निर्णय लिया, वहीं से आडर दिया और आब इंतज़ार कर रहा हूँ कि आये.

कोलोन से रिजु आया है कुछ दिनों की छुट्टियों में. कल रोम गया था. आज उसके साथ वेनिस जाने का सोचा है. एक्वाडोर से आने के बाद ७ घंटे के जेट लैग को अभी काबू नहीं कर पाया हूँ, थोड़ा ही सो पाता हूँ और दिन भर नींद आती रहती है. गरमी भी बहुत है और उमस भी.

रिजू को देख कर बड़े दादा की याद आ जाती है और रिजु के बचपन की. दादा की शादी थी. शादी के बाद तुरंत पति पत्नि अमरीका में पढ़ाई के लिये जा रहे थे. हम सब बच्चे लोग गप्पबाजी और खेल कूद में मस्त थे. लगता था जीवन जैसे कोई लम्बी सड़क हो जो कभी स्माप्त नहीं होगी, बस सिर्फ खेल कूद और हँसी मज़ाक, बस यही होगा जीवन.

अमरीका से भाभी की चिट्ठी आयी, साथ में दो फोटो भी. एक फोटो में अमरीका का अपार्टमैंट, दूसरी में भाभी यूनीवर्सिटी के बाग में, साथ में एक चीनी या कोरियन चेहरे वाली एक लड़की. सब मुग्ध हो कर देखते. कितना सुंदर था सब कुछ. और भी सपने और गहरी साँसें. अमरीका के सपने, चमकते अपार्टमैंट के सपने, विभिन्न चेहरे वाले लोगों के सपने जो भिन्न भिन्न भाषायें बोलते हैं.

दादा भाभी छुट्टियों में वापस आये. छोटा सा बेटा. उसके पाँव के अंगूठे पर चोट लग गयी. "ओ, माय थम्ब", बोला वह और बुक्का फ़ाड़ कर रोया. सब कोई मंत्र मुग्ध. सब अचरज से उसे देखते. अंग्रेज़ों की तरह कैसे अजीब से तरीके से बोलता था वह.

वर्ष बीत गये. बहुत सारे रिश्ते बदल गये. कई नये रिश्ते बन गये. घर बदल गये. शहर बदल गये. नाम बदल गये. सपने भी बदल गये. कुछ सच हो गये, कुछ रास्ते में खो गये, कुछ नये बन गये. इतने सालों के बाद वही बेटा आया है. जब बोलता है तो लगता है जैसे दादा बोल रहे हों. अचानक बीते हुए दिन फ़िर से लौट आये हैं.

जीवन एक चक्कर जैसा है, गोल घूमता है. जहाँ से निकलता है, फ़िर वहीं से गुज़रता है. बूढ़ी या प्रोढ़ आँखे बचपन का उत्साह और सपने देख कर मुस्कुराती हैं. मालूम है उन्हें कैसे जीवन लम्बी सड़क जैसा लग सकता है और कैसे यह यात्रा अचानक छोटी सी बन जाती है. पीछे मुड़ कर देखो तो कल कितना पास लगता है और कितना दूर, कभी न वापस आने वाला.


आज एक कविता और दो तस्वीरें. कविता है अर्चना वर्मा की जिसके शब्दों के अंदर छुपी लय और धुन मुझे बहुत अच्छी लगते हैं. पूरी कविता पढना चाहें तो कल्पना पर पढ़ सकते हैं. और तस्वीरे हैं: एक्वाडोर कीटो में एक आईसक्रीम बेचने वाले की और घर में मारको, रिजु और ब्रांदो:


सौख

झुनिया को चर्राया
इज्जत का सौख
बड़के मालिक की
उतरन का कुरता
देखने में चिक्कन
बरतने में फुसफुस
नाप में भी छोटा
कंधे पर
छाती पर
कसता
बड़ी जिद और जतन से
महंगू को पहनाया.
मुश्किल है महंगू को
अब सांस लेना भी.

1 टिप्पणी:

  1. वाकई, बेहद प्रभावशाली कविता है,अर्चना जी की...
    प्रत्यक्षा

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"जो न कह सके" पर आने के लिए एवं आप की टिप्पणी के लिए धन्यवाद.

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